मन के सागर मे लहरे सी उठती है
सांसे मेरी तेरी खुशबू को तरसतीं हैं
साथ रहे मेरे साथ हर रूप में तेरा
रोशन हो जाए तुझसे कण-कण मेरा
सखा तू ही, पिता भी तू ही,
बरसों इन्तज़ार किया जिसका,
वह प्रियतम भी तू ही
जिस प्रेम में भीगने को तरसता है मन मेरा
वह अहसास, छुअन भी तू ही
समर्पण न जानू, ना ही जानू पूजा करनी
फिर भी दीवानी तू बना ले मुझे अपनी
सारे स्वर मेरे समर्पित हैं तुझको
बस वाणी तू मुझे बना ले अपनी
वदन मेरा सदा वंदन करे तेरा
शब्द भी तेरे और प्रवाह भी हो तेरा
तुझसे ही जीवन मेरा रंगा और बंधा
तू ही श्याम सखा मेरा, मैं तेरी अनुराधा
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7 टिप्पणियां:
सुन्दर भाव पूर्ण रचना।
सराहना के लिए धन्यवाद,आगे भी ब्लाग देखते रहें
और ठीक समझे तो अन्य पाठकों को भी बताएं
शब्द भी तेरे और प्रवाह भी हो तेरा
तुझसे ही जीवन मेरा रंगा और बंधा
तू ही श्याम सखा मेरा, मैं तेरी अनुराधा
bahut sunder rachna hai.
merii shubhkamnayein sweekar karein..
अरे वा..... क्या बात है अनुराधा जी :)
खूपच छान भाव आहेत गं..... मनापासून आवडली कविता :)
आता अशीच लिहती रहा....थांबू नकोस.
सुन्दर
JAI GURUDEV!
WAAAAAAAAAAHHHHHH! KYA BAAT HAI!
JAI GURUDEV!
WAAAAAAAAAAHHHHHH! KYA BAAT HAI!
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