गुरुवार, मई 22, 2008

श्यामसखा

मन के सागर मे लहरे सी उठती है
सांसे मेरी तेरी खुशबू को तरसतीं हैं
साथ रहे मेरे साथ हर रूप में तेरा
रोशन हो जाए तुझसे कण-कण मेरा
सखा तू ही, पिता भी तू ही,
बरसों इन्तज़ार किया जिसका,
वह प्रियतम भी तू ही
जिस प्रेम में भीगने को तरसता है मन मेरा
वह अहसास, छुअन भी तू ही
समर्पण न जानू, ना ही जानू पूजा करनी
फिर भी दीवानी तू बना ले मुझे अपनी
सारे स्वर मेरे समर्पित हैं तुझको
बस वाणी तू मुझे बना ले अपनी
वदन मेरा सदा वंदन करे तेरा
शब्द भी तेरे और प्रवाह भी हो तेरा
तुझसे ही जीवन मेरा रंगा और बंधा
तू ही श्याम सखा मेरा, मैं तेरी अनुराधा

7 टिप्‍पणियां:

शोभा ने कहा…

सुन्दर भाव पूर्ण रचना।

jazbaat ने कहा…

सराहना के लिए धन्यवाद,आगे भी ब्लाग देखते रहें
और ठीक समझे तो अन्य पाठकों को भी बताएं

Pramod Kumar Kush 'tanha' ने कहा…

शब्द भी तेरे और प्रवाह भी हो तेरा
तुझसे ही जीवन मेरा रंगा और बंधा
तू ही श्याम सखा मेरा, मैं तेरी अनुराधा
bahut sunder rachna hai.
merii shubhkamnayein sweekar karein..

जयश्री ने कहा…

अरे वा..... क्या बात है अनुराधा जी :)
खूपच छान भाव आहेत गं..... मनापासून आवडली कविता :)
आता अशीच लिहती रहा....थांबू नकोस.

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

सुन्दर

dv ने कहा…

JAI GURUDEV!
WAAAAAAAAAAHHHHHH! KYA BAAT HAI!

dv ने कहा…

JAI GURUDEV!
WAAAAAAAAAAHHHHHH! KYA BAAT HAI!