बुधवार, नवंबर 15, 2006

शहर की सिहरन

सांसों का आना जाना आसां समझ बैठे थे
हम कल समझे कि कितना गलत समझ बैठे थे

आती सांस को पाया, जाती सांस में बिखर गया सारा
एक ही पल में ये शहर, सिहर गया सारा

दरवाज़े पर टिकी आ‍ंखे सूनी ही रह गयीं
दश्त तक रो पडा, सिर्फ़ कहानियां रह गयीं

कैसे बेदिल मानूस थे, जिनका ये काम है
क्या उनका कोई अज़ीज़ कभी नही खोया है?

गुनह्गार तो है हम भी जो सह जाते हैं नाइनसाफियां
यू ही शिकायतें करते-करते, गुज़ार देतें है ज़िन्दगानियां

2 टिप्‍पणियां:

जयश्री ने कहा…

अनु, तुम तो जबरदस्त लिखती हो यार......! ग्रेट! अपुन तो Total fida!

जयश्री

शंतनू देव ने कहा…

Great Poem... Little on the lines of a Ghazal...